पुरी रथयात्रा का पुरी शंकराचार्य जी ने पूजन कर किया शुभारंभ,जाने पूरी कहानी-

अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट

जगन्नाथपुरी — धर्मशास्त्रों के अनुसार भगवान के चौबीस अवतारों में एक भगवान जगन्नाथ जी का अवतार भी है । हर साल उड़ीसा राज्‍य के जगन्नाथपुरी में भगवान जगन्‍नाथ की भव्‍य रथ यात्रा निकाली जाती है। आषाढ़ मास के शुक्‍ल पक्ष की द्वितीया को देश और दुनिया में विख्‍यात इस भव्‍य यात्रा का आयोजन होता है । रथयात्रा उत्सव केवल भारत ही नही बल्कि दुनियाँ के सबसे विशाल और महत्वपूर्ण धार्मिक उत्सवों में से एक है । इसी कड़ी में आज रथयात्रा का मुख्य आयोजन उड़ीसा राज्य के जगन्नाथपुरी में संपन्न हुआ। इस रथ यात्रा में भाग लेने के लिये देश-विदेश से भक्तगण जगन्नाथपुरी पहुँचकर मनमोहक दर्शन यात्रा का आनंद लेते नजर आये। शासन प्रशासन द्वारा सुरक्षा के कड़े इंतजाम किये गये थे। कई कंपनियों के शस्त्र सुरक्षा सैनिक जगह जगह तैनात रहे। श्री जगन्नाथ मंदिर से यह यात्रा अनन्त श्रीविभूषित गोवर्धनमठ पुरी पीठाधीश्वर श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज और पुरी नरेश गजपति की उपस्थिति में प्रारंभ हुआ। बड़े-बड़े तीन रथ सज-धज कर तैयार थे जिन्हें मोटी-मोटी रस्सियों से भक्त खींचते रहे। रथ यात्रा में सबसे पहले बलभद्र जी तालध्वज रथ में , उसके बाद बीच में बहन सुभद्रा जी दर्पदलन (जिसे पद्मा रथ भी कहा जाता है) रथ में और अंत में जगन्नाथ जी जिनके रथ का नाम नंदीघोष या गरुड़ध्वज है चल रही थी। हर साल की भांति जगन्नाथ यात्रा के दौरान पुरी नरेश सोने की झाड़ू से स्वयं झाड़ू लगाते नजर आये । शंकराचार्य द्वारा स्थापित आदित्यवाहिनी सेना इस रथयात्रा में नि:स्वार्थ भाव से सेवा कर रही थी। यह रथयात्रा जगन्नाथ मंदिर से निकलकर गुंडिचा माता मंदिर पहुँची जहाँ भगवान विश्राम करेंगे और दशमी तिथि को पुन: जगन्नाथ मंदिर आयेंगे। जगन्नाथ मंदिर जो भगवान जगन्नाथ को समर्पित हिन्दुओं के चार पवित्रतम धामों में से एक है, समुद्र तट पर भुवनेश्वर से 60 कि.मी. की दूरी पर है। 12वीं शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण हुआ था। यहां भगवान जगन्नाथ बहन सुभद्रा और बड़े भाई बल्लभ के साथ विराजमान हैं। माना जाता है कि भगवान विष्णु जब चारों धामों पर बसे अपने धामों की यात्रा करते हैं तो हिमालय की ऊँची चोटी बद्रीनाथ धाम में स्नान, पश्चिम में गुजरात के द्वारिका में वस्त्र धारण, पुरी में भोजन और दक्षिण में रामेश्वरम में विश्राम करते हैं। पद्म पुराण के अनुसार श्री जगन्नाथ के अन्न भक्षण से सबसे अधिक पुण्य मिलता है।