निर्जला एकादशी – राष्ट्रीय सूचना प्रसारण आयुक्त अरविन्द तिवारी की कलम ✍ से-

रायपुर — वृषम संक्रांति और मिथुन संक्रांति के बीच ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहा जाता है क्योंकि यह व्रत बिना पानी पिये रखा जाता है । इसे भीमसेनी एकादशी या पाण्डव एकादशी भी कहते हैं । इस बार निर्जला एकादशी पर गुरुवार होने से शुभ संयोग बन रहा है । ज्योतिष विद्वानों के अनुसार यह संयोग छह वर्ष बाद बन रहा है। इस दिन लोग निर्जल व्रत रखकर विधि-विधान से दान करते हैं । एकादशी व्रत विशेष रूप से जगत के पालनकर्ता भगवान विष्णु के निमित्त किया जाता है । यह व्रत जीवन में सर्व समृद्धि देने वाला और सदगति प्रदान करने वाला माना गया है। इस दिन “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय ” का उच्चारण करते रहना चाहिये ।इस दिन जल से भरा हुआ घड़ा वस्त्र आदि से ढककर किसी सुपात्र को दान करना चाहिये ।इस व्रतके अंतराल जो मनुष्य स्नान , दान , तप करते हैं उसके फल का वर्णन भी नही किया जा सकता। वर्ष भर में कुल 24 एकादशी आती हैं लेकिन निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में श्रेष्ठ माना गया है।
साल में पड़ने वाली 24 एकादशियों में निर्जला एकादशी का सबसे अधिक महत्व है । इसे पवित्र एकादशी माना जाता है । मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत रखने से सालभर की 24 एकादशियों के व्रत का फल मिल जाता है । इस वजह से इस एकादशी का व्रत बहुत महत्व रखता है ।