गर्भगृह में सदाचार सम्पन्न पुजारी या अधिकृत व्यक्ति का ही प्रवेश हो – निश्चलानंद सरस्वती

अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट

कबीरधाम — कबीरधाम जिला के सारँगपुरखुर्द में पुरी पीठाधीश्वर अनंत श्रीविभूषित श्रीमद्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने आध्यत्मिक संगोष्ठी के दौरान एक प्रश्न का उत्तर देते हुये कहा कि मन्दिर निर्माण की कुछ शास्त्रीय विधा परम्परा होती है। बिजली के प्रयोग को लेकर विधि निषेध का नियम क्रियान्वित होता है। इसके प्रयोक्ता लाभ ले सकें तथा हानि से बच सकें इसके लिये विधि निषेध का निर्माण किया गया। इसके पीछे न राग था, न द्वेष था, न कोरी भावुकता थी और न अज्ञानता ही थी। ठीक इसी प्रकार सनातन वेदादि शास्त्रों के आधार पर जल ,थल ,नभ में व्यापक जो सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा हैं उन्हें मांत्रिक, तांत्रिक विधा से अर्चाविग्रह में अभिव्यक्त किया जाता है। भगवान का वह दिव्य तेज विद्यमान रहे, विस्फोटक न हो या तिरोहित न हो, इस भावना से वेदादि शास्त्रों के मर्मज्ञ मनीषियों ने मूर्ति के पूजन, उसकी समर्चा सेवा के सम्बंध में विधि निषेध संहिता की संरचना की । उसका अनुपालन करने पर व्यक्ति लाभान्वित होता है, हानि से बचता है। व्यक्त वस्तुओं को लेकर विधि निषेध की प्राप्ति होती है। मूल मन्दिर (गर्भगृह) और मन्दिर के दर्शक दीर्घा में कुछ अंतराल होना चाहिये। वर्षा आदि से बचने के लिये छज्जा होना चाहिये । मूल मन्दिर और दर्शक दीर्घा में संलग्नता नही होनी चाहिए।

हमारे पूज्य गुरुदेव धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज ने एक बार हमसे कहा था कि भविष्य में घोर नास्तिकता छायेगी। श्रुति, युक्ति, अनुभूति अर्थात दर्शन, विज्ञान और व्यवहार तीनों में सामंजस्य साधकर लिखना और बोलना, पूरे विश्व मे विजयी हो जाओगे। उनका आशीर्वाद भी था, उनकी प्रेरणा भी थी। उसी शैली में मैं बोलता हूं। मेरा खंडन विश्व में कहीं होता ही नही है। कम्युनिस्ट भी मुझ पर लट्टू। कोई मेरा विरोधी नहीं। मैं एक प्रतिशत भी समझौता वादी नहीं हूं। पूरे मनुवादी हूं। मनु का अर्थ होता है मंत्र और मन्त्रार्थवेत्ता। मन्त्र को न समझने के कारण ही कोसा जाता है। उसको समझे बिना उत्तम व्यक्तित्व और शासनतंत्र की संरचना नहीं हो सकती। हमने बताया कि गर्भ ही नहीं, मण्डप भी जहां से व्यक्ति दर्शन करते हैं उसमें भी अंतराल होना चाहिये ।

गर्भगृह में सदाचार सम्पन्न पुजारी अथवा अधिकृत व्यक्ति ही जा सकते हैं। यह व्यवस्था मैंने श्रीजगन्नाथ मन्दिर पुरी ( उड़ीसा ) में दी। जहां डेढ़ सौ वर्षों से अव्यवस्था थी। कोर्ट ने भी कहा कि शंकराचार्य के निर्णय पर संशोधन, परिवर्धन नही किया जा सकता। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने कहा कि कोर्ट को या शासन तंत्र को भी शंकराचार्य के निर्णय पर परिवर्तन या परिवर्द्धन का अधिकार नहीं है। सदाचार सम्पन्न, यज्ञोपवीत-शिखा सम्पन्न, अधिकृत पुजारी अथवा अधिकृत व्यक्ति ही मूर्ति का स्पर्श कर सकते हैं। बाकी व्यक्ति मण्डप से दर्शन कर सकते हैं। गर्भगृह में जहां तक हो सके सबका प्रवेश नहीं होना चाहिये ।