अपराध की दुनिया में फिसलते किशोरों के पांव। —————————— डॉ॰ मनोज कुमार ————————————-

उड़ते आसमानों में बाहें फैला कर जीने की बातें करना।मीठे सपनों के आगोश में समाये रहना।पल भर में दुनिया को मुट्ठी में करने की बातें युवाओं के मुख से सुनना।हर किसी को अपने बालपन के अड़ियलपन व किशोरावस्था की दहलीज की यादें दिलाता है। अख्खड़पन भरे जज्बाती किशोरों ने अब इतनी कम उम्र में ही जवानी की सारी कशमकश को खुद में समेट लिया है। अब हमारे हिन्दुस्तान में भी महज 14 साल की उम्र में परिपक्व होते विचार देखने को मिल रहे है, सपनो को पुरा करने के लिए हद से ज्यादा और क्षमता से अधिक हौसला दिया जा रहा है।
युवाओं की बदलती मानसिकता कुछ मामले में उन्हें अपराध के रास्ते पर ले जा रही है। पढाई का बोझ हो या साथियों का दबाव,कम समय में पुरा करने की जिद्द छोटे-मोटे अपराध करने के लिए उन्हें मजबूर कर रहा है।

किशोरावस्था का अल्प विकास बना रहा अपराधी ।

स्कूल-कालेज के नवयुवकों के समक्ष खुद को साबित करने के अनगिनत अवसर होते हैं। घर हो या शैक्षणिक संस्थान अगर बच्चे खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं तब वह हीन भावना से ग्रसित होने लगते हैं। वह जल्दी किसी ग्रुप में शामिल होकर अपनी एक मजबूत पहचान बनाने की जुगत मे लग जाते हैं और समूह के आकाओं के गलत या नियमविरूद्ध कोई भी काम में लिप्त होकर अपनी योग्यता दिखाने लगते हैं।

खुद की पहचान की जदोजेह्द।

अपराध की ओर रूख कर रहे किशोर खुद की योग्यता व पहचान से वाकिफ न होकर किसी घटना से ज्यादातर प्रेरित होते रहते हैं। घटना को अंजाम देनेवाले को अपना आइडियल मानते हैं और उनके नक्शे कदम पर चलना चाहते है। इसके लिए गली मोहल्ले में अपनी साख जमाने के लिए किसी को धमकी देना ,चौराहे पर खड़े रहना और लोगो को डराने का काम करते हैं।

माता-पिता से नाराजगी।

क्राईम की राह में चल रहा युवा माता-पिता को तिरस्कृत भाव से देखता है। उसकी नाराजगी बेहतर लालन पालन या जरूरतो को पुरा नही करने से भी होती है।

क्षमता से अधिक खुद को आंकना ।

अपराध के रास्ते में चलने वाला बंदा जरूरत से ज्यादा अपने आप को आंक लेता हैं और इसका शोर वह साथियों में भी सुनियोजित तरीके से मचाये रखता हैं यही कारण है कि उसे गंभीर अपराध करने के लिए भी प्रेरणा मिलती रहती है।

लचर कानून से अविश्वास ।

छोटे मोटे अपराध करने पर पुलिस द्वारा अपराध के परिणाम को बतलाये बिना जेल भेजना या पैसे लेकर मामला रफा दफा कर देने से इस तरह के अपराधी किशोर के मनोबल को बढ़ा देता है। नतीजतन किशोर अपराध के परिणाम व गंभीरता को जानने के बजाए नित्य अपराध करता जाता है।

पुलिस दोस्त बनकर करे सहायता।

अगर पुलिस शुरू में ही पहली बार छोटे-मोटे अपराध करने वाले किशोर अपराधी को काउंसलिग कर दे तो कानून के लिए उनकी इज्जत बढ जाती है और दुबारा वह कानून नही तोड़ते।

13 साल से 17 साल में ज्यादा होते हैं किशोर अपराध।

किशोरावस्था की दहलीज अगर गंभीर चुनौतियो के दौर से गुजर रहा है तो किशोर अपने आवेग पर काबू नही कर पाता है।मसलन लूट,डकैती हत्या ।कुछ मामले में बदला लेने की चाहत होती हैं समाज के प्रति।
वह नियम कायदे कानून को तोड़ते है और खुद को वी आई पी समझने के मुगालते मे रखते हैं।

साइकोपैथ या एण्टीसोशल व्यक्तित्व के होते हैं शिकार।

इस तरह के अपराध में शामिल युवा काफी झूठ बोलते हैं ।घर हो या शिक्षकों से,दोस्त हो या गर्लफ्रेंड सब से झूठ बोल कर अपना दबदबा बनाये रखते हैं। अपनी शान को बचाये रखने के लिए बाईक चोरी,नशे का व्यापार,जुआ व मैच फिक्सीग करके रूपये इकठ्ठा करते रहते हैं। लोगो को धोखा देना व अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करना अपनी शान समझते हैं। नशा करना और नये -नये लड़को को अपने ग्रुप में शामिल करवाकर गैंग बनाना इनकी आदत में शुमार है। समय समय पर गैंग की शक्तियों से लोगो को परिचित कराने के लिए प्रशासन को खुलेआम चुनौती देना भी इस अपराध की अहम कड़ी है।

संभव हैं समाधान।

किशोरो के अपराध के ग्राफ को कम करने के ख्याल से ही जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड बिहार में अपना काम कर रही है।यहां किशोरो द्वारा किसी अपराध को घटित कर देने पर कानून के अंतर्गत सजा का भी प्रावधान है लेकिन उसके पहले इंसान बनाने का पुरजोर प्रयास भी किया जा रहा है। बिहार पुलिस किशोरों को अपराध के परिणाम व उसकी गंभीरता अगर प्रथम बार के अपराध के समय ही काउंसलिग कर बता दे तो इस तरह के अपराध के ग्राफ कम हो सकते है।इसके लिए आम पब्लिक का सहयोग अपेक्षित है। स्कूल-कालेज व पुलिस थानो से लोकल स्तर पर किशोरो से जुड़े अपराध पर खुलकर चर्चा करने का समय आ गया है।

मिजाज।

मेरे दस साल से अधिक के कॅरियर में युवाओं पर मैंने इस साल तक जो रिसर्च किये वो चौकाने वाले रहे।वास्तव में अब यहाँ के युवाओं की भी मानसिक स्वास्थ्य की दुनिया बदल रही है।

बदलाव एक अबूझ पहेली।

ज्यादातर मेरे पास इस साल ऐसे केसेज आयें ।जो अब स्कूल को पास कर बारहवीं में एडमिशन ले रहे थे।राजधानी पटना होने की वजह से दूर-दराज के युवा यहाँ विभिन्न संकाय में पढ रहें है। नये जगह में नये लोगो से घुलने की जद्दोजहद इनके जिंदगी में तनाव का विष घोल रहा है।कुछ मामलों में मैने पाया की घर छोड़ यहाँ रहनेवालो में भावनात्मक अभिव्यक्ति कि कमी देखी जा रही है,जिससे उनमें अकेलापन और सोशल साइट पर ज्यादा समय बिताने की समस्या पाई जा रहा है।

युवाओं के लिए शारीरिक और मानसिक परिवर्तन एक पहेली।

मेरे पास पटना के सबसे महंगे संस्थानों में पढनेवाले आर्थिक-समाजिक रूप से परिपूर्ण युवाओं से लेकर गरीब ,बेसहारा,अनाथ बेबस और लाचार युवाओं के अलावे अपराधिक गतिविधियों में शामिल युवा भी मिलते रहे हैं. सभी केसेज में मुझे उनमें अभिभावकों द्वारा अपेक्षाओं के बोझ तले दबे हुए देखने को मिल रहे है।
(लेखक डॉ॰ मनोज कुमार,बिहार के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक है। इनका संपर्क नं 9835498113 है।)