हार के पिछे एक बड़ा सवाल छोड़ गए कन्हैया?कन्हैया कि हार के पिछे एक बड़ा सवाल,कौन है वो 2 लाख 67 हजार लोग-?Ravi Sharma…

पटना-लोकसभा चुनाव 2019 मे देश के कुछ प्रमुख सीटों मे बेगुसराय संसदीय सीट का नाम हमेशा चर्चा मे रहा.इस लोकसभा सीट से जेएनयू के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार सीपीआई के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे,और उनके सामने हिंदू हृदय सम्राट और भाजपा के फायर ब्रांड नेता कहे जाने वाले गिरिराज सिंह थे.हालांकि गिरिराज सिंह ने पहले बेगूसराय से चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया था.उसके बाद विभिन्न सुत्रों से आ रही खबरों के मुताबिक बहुत समझाने और पार्टी के दबाव के बाद उन्होंने बेगूसराय से लड़ने का सिंबल लिया.उसके बाद इस लड़ाई को त्रिकोणीय बनाने के लिए राजद के कद्दावर नेता तनवीर हसन ताल ठोक रहे थे.खैर लोकसभा चुनाव हुए.सोशल मीडिया भी चुनाव प्रचार में सक्रिय भूमिका निभाती रही.आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहा.गिरिराज सिंह कुछ हद तक अपने हिंदुत्व,मोदी मैजीक औऱ विकास के मुद्दे पर स्टैंड रहे तो कन्हैया भय,भूख, भ्रष्टाचार,गरीबी,असमानता, जातिवाद और सेकुलरिज्म के मुद्दे को लेकर मुखर रहे.तनवीर हसन कुछ आधारहीन मुद्दों के साथ लड़ाई को त्रिकोणीय बनानेका प्रयास करते रहे.जेएनयू छात्र संघ से देश विरोधी नारे लगाने के आरोपों के बाद बेगूसराय संसदीय सीट से सीपीआई के उम्मीदवार बनने तक का कन्हैया का सफर खासा दिलचस्प रहा.जेएनयू कैंपस में कन्हैया और उनके सहयोगियों पर देश विरोधी नारे लगाने का आरोप लगा.कोर्ट, जेल,पुलिस,तमाम प्राथमिक कानूनी प्रक्रियाएं हुई.कुछ दिनों में कन्हैया बाहर भी आ गए.लेकिन अब लड़ाई छिड़ चुकी थी.सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेताओं से कन्हैया ने मूलभूत सुविधाओं की कमी पर सवाल पूछना जारी रखा और सत्ता पक्ष राष्ट्रवाद,राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास के मुद्दे पर अडिग रहा.विचारधाराओं कि असहमती को अपराध मान लेने कि प्रवृती जो आज कि राजनिती मे पनप रही है वह इस देश के स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है और इसके दुरगामी परिणाम दुखद होगें.इस बीच विरोधियों ने पूरे देश में कन्हैया की छवि एक राष्ट्र विरोधी के रूप में भी बनाई और इलेक्ट्रॉनिक,प्रिंट और सोशल मीडिया पर चल रही खबरों ने कन्हैया का एक विकृत चेहरा जनता के सामने पेश किया.देशद्रोह के आरोप के साथ साथ कथित रूप से टुकड़़े-टुकड़े गैंग के सरदार होने कि उपाधियों से भी नवाजा गया.कन्हैया के समर्थन मे देश के कई क्षेत्रों से दिग्गज औऱ वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग कन्हैया के समर्थन मे बेगुसराय पहुंचे.अपने अस्तित्व कि लड़ाई लड़ रही सीपीआई के लिए कन्हैया संजीवनी बन कर उभरे थे सो वामपंथी विचारधारा से प्रभावित समुह ने कन्हैया के समर्थन मे कोई कसर नही छोड़ी.खैर देश मे लोकसभा चुनाव हुए.राष्ट्रवाद,राष्ट्र की सुरक्षा,हिंदुत्व विकास आदि के मुद्दों पर 7 चरणों का चुनाव भाजपा ने लड़ा और कन्हैया भय,भूख,भ्रष्टाचार, बेरोजगारी,गरीबी,असमानता, जातिवाद और सेकुलरिज्म के मुद्दों पर.चुनाव संपन्न हुए.

*-* कौन है वो 2 लाख 67 हजार लोग-

परिणाम आए और भाजपा को देश मे प्रचंड बहुमत मिला.कन्हैया को बेगुसराय कि सीट पर गिरीराज सिंह ने करारी शिकस्त दी.पूरे चुनाव में मीडिया के मुताबिक मुख्य लड़ाई में गिरिराज और कन्हैया ही रहे.तनवीर नंबर दो की जद्दोजहद में ही लड़ाई को त्रिकोणीय बनाने का संघर्ष करते रहे.चुनावी समर में कन्हैया को लगभग 2 लाख 67 हजार मत प्राप्त हुए.
अब सवाल यह है कि कौन है वह लोग जिन्होंने कन्हैया को लगभग 2 लाख 67 हजार मत दिया?
अगर विरोधी कहते हैं कि कन्हैया देशद्रोही है तो अव्वल बात कि उन्हे चुनाव लड़ने क्यों दिया गया?हालांकि अभी तक यह बात अदालत में कोई साबित नहीं कर सका कि कन्हैया कुमार देशद्रोही है.
सत्ता पक्ष की अगर हम मान भी ले कि कन्हैया कुमार देशद्रोही है तो अब इन 2 लाख 67 हजार लोगों की पहचान कैसे होगी जिन्होने देशद्रोही को समर्थन दिया.या देश के लोग यह मान ले कि इन 2 लाख 67 हजार लोगों मे राष्ट्रवाद की भावना मर चुकी है,इन्हे राष्ट्र से प्रेम नहीं है…..

*-*कन्हैया कि हार के पिछे एक बड़ा सवाल-


और अगर ऐसा कुछ नहीं है तो स्पष्ट है कि जिस सिस्टम में हम जी रहे हैं उसमे सब कुछ ठीक नहीं है.एक कन्हैया कुमार की आवाज को दबाना मुश्किल था अब तो यह हुजूम है.मूलभूत समस्याओं के समाधान के लिए अगर सिस्टम से बगावत के स्वर मुखर हुए हैं तो यह मौजूदा सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि उन समस्याओं का समाधान करें या दुसरा रास्ता है कि कन्हैया कुमार जैसे तथाकथित देशद्रोही जिसके पीछे लाखों का हुजूम है उन सब का दमन कर दे.मगर युवाओं में जो क्रेज कन्हैया कुमार के प्रति,उसके द्वारा उठाए गए मुद्दों के प्रति दिखा उससे यह स्पष्ट होने लगा है कि कन्हैया कुमार युवाओं के आइकॉन बन रहे हैं,एक विचारधारा बन रही है.और ताकतें,हुकुमतों के द्वारा व्यक्ति का दमन किया जा सकता है, विचारधाराओं का दमन मुमकिन नहीं है.

रवि शर्मा-