हमें अपने पूर्वजों एवं आधुनिक राष्ट्र निर्माताओं के पदचिन्हों पर है चलना – महामहिम राष्ट्रपति

अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
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नई दिल्ली – उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान पूरे देश में पराधीनता के विरुद्ध अनेक विद्रोह हुये। देशवासियों में नई आशा का संचार करने वाले ऐसे विद्रोहों के अधिकांश नायकों के नाम भुला दिये गये थे। अब उनकी वीर-गाथाओं को आदर सहित याद किया जा रहा है। इक्कीसवीं सदी को भारत की सदी बनाने के लिये हमारा देश सक्षम हो रहा है , यह मेरा दृढ़ विश्वास है। हमारे पूर्वजों और हमारे आधुनिक राष्ट्र-निर्माताओं ने अपने कठिन परिश्रम और सेवा भावना के द्वारा न्याय , स्वतंत्रता , समता और बंधुता के आदर्शों को चरितार्थ किया था। हमें केवल उनके पदचिह्नों पर चलना है और आगे बढ़ते रहना है।
उक्त बातें महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने आज अपने कार्यकाल के आखिरी दिन राष्ट्र को संबोधित करते हुये कही। उन्होंने कहा कि आज से पांच साल पहले आप सबने मुझ पर अपार भरोसा जताया था और अपने निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों के माध्यम से मुझे भारत के राष्ट्रपति के रूप में चुना था। मैं आप सभी देशवासियों के प्रति तथा आपके जन-प्रतिनिधियों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूं।कानपुर देहात जिले के परौंख गांव के अति साधारण परिवार में पला-बढ़ा रामनाथ कोविन्द आज आप सभी देशवासियों को संबोधित कर रहा है , इसके लिये मैं अपने देश की जीवंत लोकतांत्रिक व्यवस्था की शक्ति को शत-शत नमन करता हूं। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि मैं विशेष रूप से उन अवसरों को याद करूंगा जब मुझे सशस्त्र बलों , अर्ध-सैन्य बलों और पुलिस के हमारे बहादुर जवानों से मिलने का अवसर मिला। उनका देशभक्ति का उत्साह जितना अद्भुत है , उतना ही प्रेरणादायक भी है।प्रेसिडेंट कोविंद ने कहा कि राष्ट्रपति के कार्यकाल के दौरान अपने पैतृक गांव का दौरा करना और अपने कानपुर के विद्यालय में वयोवृद्ध शिक्षकों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेना मेरे जीवन के सबसे यादगार पलों में हमेशा शामिल रहेंगे। अपनी जड़ों से जुड़े रहना भारतीय संस्कृति की विशेषता है। मैं युवा पीढ़ी से यह अनुरोध करूंगा कि अपने गाँव या नगर तथा अपने विद्यालयों तथा शिक्षकों से जुड़े रहने की इस परंपरा को आगे बढ़ाते रहें। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन का संकट हमारी धरती के भविष्य के लिये गंभीर खतरा बना हुआ है। हमें अपने बच्चों की खातिर अपने पर्यावरण , अपनी जमीन , हवा और पानी का संरक्षण करना है। कहा कि अपने कार्यकाल के पांच वर्षों के दौरान मैंने अपनी पूरी योग्यता से अपने दायित्वों का निर्वहन किया है। मैं डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद , डॉक्टर एस. राधाकृष्णन और डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम जैसी महान विभूतियों का उत्तराधिकारी होने के नाते बहुत सचेत रहा हूं। उन्होंने कहा कि तिलक और गोखले से लेकर भगत सिंह और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस तक , जवाहरलाल नेहरू , सरदार पटेल और श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर सरोजिनी नायडू और कमलादेवी चट्टोपाध्याय तक – ऐसी अनेक विभूतियों का केवल एक ही लक्ष्य के लिये तत्पर होना मानवता के इतिहास में अन्यत्र नहीं देखा गया है।संविधान सभा में पूरे देश का प्रतिनिधित्व करने वाले अनेक महानुभावों में हंसाबेन मेहता, दुर्गाबाई देशमुख, राजकुमारी अमृत कौर तथा सुचेता कृपलानी सहित 15 महिलाएं भी शामिल थीं. संविधान सभा के सदस्यों के अमूल्य योगदान से निर्मित भारत का संविधान, हमारा प्रकाश-स्तम्भ रहा है। अपने संबोधन का समापन करते हुये महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि मैं सभी देशवासियों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूं। भारत माता को सादर नमन करते हुये मैं आप सभी के उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करता हूं। राष्ट्रपति के अभिभाषण का सभी डीडी चैनलों और आकाशवाणी पर सीधा प्रसारण हुआ। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भारत के राष्ट्रपति के रूप में कार्यभार छोड़ने से पहले राजघाट पर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने देश के नागरिकों से महात्मा गांधी की शिक्षाओं और आदर्शों का पालन करने और उनके जीवन से प्रेरणा लेने का भी आग्रह किया। वहीं इसके पहले शनिवार शाम को संसद में अपने विदाई भाषण में रामनाथ कोविंद ने पार्टियों से राष्ट्रहित में दलगत राजनीति से ऊपर उठने की अपील करते हुये कहा था कि लोगों के कल्याण के लिये पार्टियों को दलगत राजनीति से दूर रहना चाहिये। उन्होंने नागरिकों से विरोध व्यक्त करने और अपनी मांग पूरा कराने के लिये गांधीवादी तरीकों का इस्तेमाल करने को कहा। राष्ट्रपति ने भारतीय संसदीय प्रणाली की तुलना एक बड़े परिवार से की और सभी “पारिवारिक मतभेदों” को हल करने के लिये शांति , सद्भाव और संवाद के मूल्यों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि नागरिकों को अपना विरोध व्यक्त करने और अपनी मांगों के समर्थन में दबाव बनाने का संवैधानिक अधिकार है , लेकिन उन्हें गांधीवादी साधनों का उपयोग करके अपने अधिकारों का शांतिपूर्वक उपयोग करना चाहिये। राजनीतिक दलों को अपने संदेश में राष्ट्रपति ने कहा जैसा कि किसी भी परिवार में होता है , संसद में कभी-कभी मतभेद होते हैं और आगे के रास्ते पर विभिन्न राजनीतिक दलों के अलग-अलग विचार हो सकते हैं। हम सभी इस संसदीय परिवार के सदस्य हैं। इनकी सर्वोच्च प्राथमिकता राष्ट्र के हित में लगातार काम करना है।