श्रावण सोमवार — राष्ट्रीय सूचना प्रसारण आयुक्त अरविन्द तिवारी की कलम ✍ से,यह श्रावण है खास-

देवाधिदेव महादेव को प्रिय लगने वाला श्रावण माह हिन्दू कलेंडर में पाँचवाँ और अंग्रेजी कलेंडर में सातवाँ महीना होता है जो काफी शुभ माना जाता है। इस श्रावण माह का पहला सोमवार आज से प्रारंभ हो चुका है। इस माह में शिव भक्ति और आराधना की का विशेष महत्व है ।श्रावण सोमवार की शुरुआत से ही द्वादश ज्योतिर्लिंगों सहित देश विदेशों के छोटे बड़े सभी शिव मंदिरों में शिवभक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ा है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में आज तड़के सुबह तीन बजे भगवान महादेव का श्रृँगार कर दूध-दही- घी , पंचामृत , द्रव्य पदार्थ एवं फलों के रस से भगवान शंकर का अभिषेक किया गया। ढोल , नगाड़ों के साथ आरती की गयी और इसके साथ ही श्रद्धालुओं के हर हर महादेव और ऊँ नम:शिवाय के जयकारों से मंदिर परिसर गुँजायमान हो गया और श्रद्धालु भोलेबाबा की भक्ति में लीन नजर आये ।

इस वर्ष के श्रावण मास पर खास नजर

सावन माह में इस बार कई शुभ संयोग बन रहे हैं । सत्रह जुलाई को सूर्य प्रधान उत्तराषाढ़ा नक्षत्र से सावन माह की शुरुआत हो रही है। इस दिन वज्र और विष कुंभ योग भी बन रहा है। सावन में चार सोमवार पड़ेंगे। इसके अलावा 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन भी एक ही दिन मनाया जायेगा। एक अगस्त को हरियाली अमावस्या पर पंच महायोग का संयोग बन रहा है जो संयोग लगभग 125 साल के बाद आ रहा है।
एक अगस्त को हरियाली अमावस्या पर पंच महायोग का संयोग बनेगा। जो लगभग 125 साल बाद आ रहा है। इस दिन पहला सिद्धि योग, दूसरा शुभ योग, तीसरा गुरु पुष्यामृत योग, चौथा सर्वार्थ सिद्धि योग और पांचवां अमृत सिद्धि योग का संयोग है। पंच महायोग के संयोग में कुल देवी-देवता तथा मां पार्वती की पूजा करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। साथ ही प्रकृति के हरे भरे रहने की संभावना है।
इस बार नागपंचमी का शुभ पर्व भगवान शिव के विशेष दिन सोमवार (पांच अगस्त) को है। सोमवार और नागपंचमी दोनों ही दिन भगवान शिव की आराधना की जाती है। इसलिये इस बार नागपंचमी का विशेष महत्व होगा।
गौरतलब है कि इस सावन की शिवरात्रि मंगलवार 30 जुलाई को मनायी जायेगी। सोमवार को प्रदोष व्रत और नागपंचमी का योग श्रेष्ठ होता है। सावन में भगवान शिव का अभिषेक किया जाना चाहिये।
परम्परागत मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव के सिर पर स्थित चंद्रमा अमृत का द्योतक है। गले में लिपटा सर्प काल का प्रतीक है। इस सर्प अर्थात काल को वश में करने से ही शिव मृत्युंजय कहलाये। उनके हाथों में स्थित त्रिशूल तीन प्रकार के कष्टों दैहिक, दैविक और भौतिक के विनाश का सूचक है। उनके वाहन नंदी धर्म का प्रतीक हैं। हाथों में डमरू ब्रह्म निनाद का सूचक है।