चक्रव्यूह! द स्टोरी ऑफ मन-मिजाज। ————————————- डॉ॰ मनोज कुमार

शमशाद धूप से बचना चाह रहा था।वह सड़क किनारे लगे पेड़ की आड़ लिए चला जा रहा था।रह-रह कर उसके जेहन मे आज अपनी जलालत याद आ रही थी।वह सब का जवाब दे सकता था।पता नही क्यों वह अपनी बेइज्जती बर्दाश्त करता रहा।बचपन मे भी वह दुसरे की करनी की सजा खुद पाता रहा था।जब स्कूल मे था तब टीचर की किच-किच ‌‌।हमेशा शिकायत वह सवाल नही पूछता‌।पूछने पर जवाब नही देता।उसके अब्बू हमेशा उसे ताने दिया करते ।नकारा ,नासमझ बुरबक और न जाने क्या- क्या उपनाम मिले।शमशाद जब किशोरावस्था मे रहा ।तब कभी जोया की ऒर भी मुखातिब रहा।जोया व शमशाद एक दुसरे को पसंद करते थें।जोया बात -बात में उसके नजदीक आने की कोशिश करती।हर बार वह इस डर से जोया से दूर रहा।वह तो उतना सुंदर नही जितनी खूबसूरती जोया में है।वह परी जैसी बड़ी बड़ी आंखों वाली।सुनहरे काले बाल ।जोया जब हंसती तब उसके गालों मे डिम्मल आते।शायद यही क्यूटपन की वजह थी ।शमशाद के रिझने की‌।पर वह कभी भी खुद को उसके लायक नही समझा।बचपन से ही वह खुद को नकारा समझता गया ।पढाई मे ठीक था पर आज वह अपनी खूबियों को समझ नही पा रहा था।वह कभी भी समाजिक उत्सव मे भाग नही लेना चाहा।जब घर मे अतिथि आते तब वह जानबूझकर सोने का नाटक करता ।कुछेक बार वह खुद को कमरे मे कैद कर लेता।घुटन,मलाल मे रहकर जिता रहा था वो! और आज आॅफिस मे लोगों की बातों पर चुपके-चुपके सिसकियां ले रहा था।यह उसकी आदत मे शुमार हो चुका था।वह अपने इन गुणों की वजह से कई बार अच्छे नौकरी मे चयन के बावजूद इंटरव्यू मे छंटता रहा।आज वह अनचाहे काम को कर रहा था ।न जाने कितने अनचाहे दर्द के साथ।
दरअसल शमशाद मे तमाम अच्छाई रहते हुए भी वह खुद के प्रति दीन-हीन विचारधारा रखता है।पटना मे मेरे पास जब वह आया तो जिंदगी से पुरी तरह निराश,हताश था।लगातर कुछ काउंसलिंग के बाद उसकी तबीयत उम्दा हुयी ।

व्यक्तित्व विकास की जड़ बचपन।

दरअसल व्यक्तित्व का विकास बचपन से ही शुरू हो जाता है ।इसी विकासक्रम मे अगर इंसान को नकारात्मक परिस्थितियों से गुजरना पड़े,उसकी भावनात्मक विकास मे रोड़ा उसका परिवार बनने लगे,तब व्यक्ति इनफिरीटि कॉम्पलेक्स का शिकार हो जाता है।इस समस्या से ग्रसित इंसान खुद को नकारा व अनुपयोगी समझने लगता है ।नतीजतन वह ईश्वर की दी हुयी खूबियों को भी पहचान नही पाता।

पस्त होते हौसलें।

जो लोग इस तरह की समस्या से पीड़ित होते हैं।
वह अपने आप मे इस कदर परेशान होतें हैं कि वह अपने परिवार, समाज व काम-धंधे को पूरी तरह बर्बाद देखते हुए समझने की कोशिश करते है‌ं।हौसले पस्त होने की वजह से वह साधारण काम को भी अमान्य करार देते है।इन सब का असर उनके कामयाबी के ग्राफ पर आप सीधे देख सकते हैं।

राह नहीं हैं मुश्किल ।

हर व्यक्ति में अपूर्व क्षमताएं होती हैं। उम्र के किसी पड़ाव में भी संभला जा सकता है। छोटी-छोटी योग्यता को अपनाकर बड़े-बड़े कार्यों को किया जा सकता है। जरूरी हैं अपने भीतर झांकने की एक कोशिश की।
——(लेखक डा.मनोज कुमार, बिहार के सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक हैं। इनका संपर्क नं 8298929114,9835498113 है।)